دوبیتی های سوگ همسر -42
بسمۀ تعالی
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دوبیتی های سوگ همسر -42
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ببین همسر چه تنها گشته ام من به دست غم چه رسوا گشته ام من
غم آمد بر دلم گردیده انبوه میان غم هویدا گشته ام من
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غم آمد با خودش آورده غصّه چسان نرمش کنم با دست و پنجه
هیولائی شده در جسم و جانم نمی آید برون از قلب و سینه
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تو روحت شاد باشد، شاد گردم ز هر درد و غمی آزاد گردم
هم اکنون دردوغم،گردیده انباشت اگر بیرون شود آباد گردم
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خودش را کرده غم محبوس در دل در آنجا آورد هر گونه مشکل
گهی مغشوش گردد فکر و ذهنم گهی هم می زند بر آب و بر گل
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زند بر سینه، آرد سوز سینه گهی هم بر جگر، آهی اشاره
گهی از چشم آید آب دیده به هر عضوی کند هر دم نظاره
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به قلبم شد ز تیرش هر نشانه گهی آرام و گاهی پُر اصابه
بلرزاند دلم را هر زمانی که از کیدش ندارم من افاقه
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گهی کند و گهی شدّت در آن است به قصد کینه آید فرصت آن است
به آن وقتی که دارم استراحت فشارم آورد، کی استقامت
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به تشویش آورد هر عضو من را ندارم قصد صحرا و دمن را
کند دیوانه ام، پس چاره ای نیست مطیع غم شوم،هیچ سایه ای نیست
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ندارم سایه ای تا دل کنم خوش نشینم من در آن، تا آیدم هوش
ز غمباد، این دلم را حستگی هست که هر شادی شود از دل فراموش
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بگرید دیده از دوریِّ همسر ز دیده اشک می ریزد ز هر در
نباشد چاره ای تا بند آرم به دامن هم بریزد، پشتِ سر هم
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گهی آید گلو را هق هق از آن نفس را بند آرد راه بندان
چه مشکل می شود برآن نفس ها خروج پُر صدا دارد به میدان
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شود تبدیل سرفه عطسه ها را به هم ریزد وجودم هر چه پایا
دگر بر من نباشد پا به ایستم بیفتم بر زمین اینجا و هر جا
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مرا جز پایمردی، بسته هر راه توانم کی بُوَد ایستم به این پا
خدا دارد کمک بر جسم زارم به پا خیزم به اُمّید تو یارا
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چسان سازم من،از آثار این غم به هر جا و زمان من آورم کم
خدا یا خود ز من آگاه باشی نگردم من خجل از شرم و آذرم
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روز یکشنبه مورّخۀ 1399/11/26
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اينجانب عباس توكلي فرزند مرحوم كربلايي مهدي توكلي، مايل هستم از طريق اين وبلاگ، با اهالي روستاي كلاونگا، در جهت يادآوري آداب و رسوم (فرهنگي، اجتماعي، مذهبي) و آشنايي مجدد افراد با آنها، ارتباط برقرار نمايم. همچنين انتظار ميرود اهالي محترم در جهت نيل به عمران و آبادي روستا با اعضاي محترم شوراي اسلامي، همكاري بيش از پيش داشته باشند. بنابراين همت مضاعف و كار مضاعف همه دوستان را آرزومندم.