دو بیتی های سوگ همسر - 33
بسمۀ تعالی
**********
دو بیتی های سوگ همسر - 33
************************
اگر دانی چقدر نالیده ایم ما زدیم بر سینه هم سر وای و ویلا
ندیدی اشک ها را دیده جاری است نیامد خانۀ دیگر به نجوا
--------------------------------------------------------------------------------------
ستون از خانه ات یکدم فرو ریخت زهرکس ناله ای زآنجا،برانگیخت
نشد این خانه دیگر رو به آباد غمیّ و غصّه و ناله در آمیخت
---------------------------------------------------------------------------------------
هزاران درد و غم بر دل نشسته چه سنگین بوده است،چون دل شکسته
خودت هر زخم را کردی مداوا ترحّم شد به من، از هر چه رسته
-------------------------------------------------------------------------------------------
میان این دو دل را پرده ای نیست خدا را شکر، در آنها خُرده ای نیست
نبوده غل و غش در بین آن دو تفاوت هم در آن دو ذرّه ای نیست
------------------------------------------------------------------------------------------
حدا یا همسرم را شاد گردان تو روحش را به من آزاد گردان
تو را گویم چه آمد بر دل من دل نا شاد را آباد گردان
----------------------------------------------------------------------------------------
شب و روزم به تو مشغول گردید به هر کاری تو را معمول گردید
فقط همسر مهم است از برایم هر آن دارم از او محصول گردید
-----------------------------------------------------------------------------------------
تو بودی باغ گل هر دم برایم تو رحمت بوده ای اندر سرایم
تو را بودن به من بوده غنیمت ز عطر و بوی تو بوده غنیمت
------------------------------------------------------------------------------------------
خدا یا داده ای بر من تو همسر که او بوده مرا از هر چه بهتر
اگر چه رفته اکنون از بر من ولیکن مانده از او هر چه خوشتر
-----------------------------------------------------------------------------------------
نگیر از من خدا یا سایه اش را که باشد سایه اش، مانند او را
دلم خوش جان من خوش هرچه راخوش مرا از خاطرات او است غو غا
------------------------------------------------------------------------------------------
تو را در کارِ خانه نظم بسیار خودت را کرده ای در آن گرفتار
به کار آشپزی خود را تو مشغول تو را بود لطف بسیاری به انبار
-----------------------------------------------------------------------------------------
به پخت و پز همی بودی تو ماهر بسی از سال ها بودی تو شاطر
موادّ اوّلی بوده فراهم به یک وقت چند غذایت بوده حاضر
--------------------------------------------------------------------------------------------
تو را بوده مهارت در غذا ها به خوش طعمیّ ِ آن کی بوده هر جا
به خوردن از غذایت اشتها بود چه خوش مزه چه خوش رنگی ازآنها
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------
ز ترشیجات و ادویّات به در بود به سال و فصل و ماهش در نظر بود
تورا بودترشی اندرسیّ وچندسال تو را جمع در جمیع هر هنر بود
---------------------------------------------------------------------------------------------
تو را بود سفره ها رنگین و زیبا بسی ساده، ولی بود دل فریبا
نبوده هر کجا آن رنگ و آن بو عجب طعمی عجب بوئی چه دلخواه
*********************************************************
روز دوشنبه مورّخۀ 1399/11/15
//**********************//
اينجانب عباس توكلي فرزند مرحوم كربلايي مهدي توكلي، مايل هستم از طريق اين وبلاگ، با اهالي روستاي كلاونگا، در جهت يادآوري آداب و رسوم (فرهنگي، اجتماعي، مذهبي) و آشنايي مجدد افراد با آنها، ارتباط برقرار نمايم. همچنين انتظار ميرود اهالي محترم در جهت نيل به عمران و آبادي روستا با اعضاي محترم شوراي اسلامي، همكاري بيش از پيش داشته باشند. بنابراين همت مضاعف و كار مضاعف همه دوستان را آرزومندم.