دو بیتی های سوگ همسر - 31
بسمۀ تعالی
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دو بیتی های سوگ همسر - 31
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غمت بسیار سنگین است بر دل مرا در زندگی این است مشکل
که هر سختی به آسانی شود حل ولی این غم مرا منزل به منزل
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در این مدّت نشد از غم مرا کاست که غم شددردلم درکاشت وبرداشت
زیادت شد از آن در این زمانه دل پُر خون من لرزد به سینه
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اگر غم اندکی بودی چه می شد مراهمسر به برمی شدچه می شد
خدا یا خود بدانی مصلحت را نگویم من دگرچونست چه می شد
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خدا یا هر چه آمد شکر دارم صلاح و مصلحت را از تو خوانم
ندارم من گله یا هر شکایت هر آن چه از تو آید نیک دانم
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خدا یا هر چه در دل بود عیان شد ز پیدا هم ز پنهانش بیان شد
نماند اند ر دلم، نا گفته باشم ز عشق همسرم آن هم گمان شد
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گمانم بوده او مانَد به پیشم ندانستم رود از نزد خویشم
من از خویشی بر او مسرور بودم چرا آمد چنین غم، یا که نیشم
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بگویم درد دل تکرار تکرار ندارد کس از آن تکرار، اصرار
چه آمد بر سرم خاک دو عالم که باشد بر من بیچاره اضرار
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بریزد بر دلم هر درد و زهری کند بیچاره دل رل تا به دهری
دلم از دردوغم لاش است ومجنون که دردیوانگی هجراست وقهری
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پناه از خون خود، رو بر که آرم که آرامش دهد، راند ز باکم
دل پُر خون من موجی در آن است درون موج آن، همسر چه سازم
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نمی ارزد خورم، از دل همه خون چه باشد حاصلش ، دیوانه مجنون
که نه دیوانه باشم، نه که مجنون که دل از داغ همسرگشته بی چون
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دل بیچاره ام اندر گرو بود حیات همسرم دل در وِتو بود
نبود دل دست من هیهات هیهات هم اکنون هم پریشان،دل به تُو بود
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دگر معنا ندارد دل از این رو دل غمدیده ام هر جا بُوَد رو
دلی را کاو ندارد جنب و جوشی ندارد ارزشی، کی بوده در سو
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دلا دل کرده ام دل را دلی بود دل بی آب و گل را منزلی بود
در آن منزل هزاران مشکل آمد که هر مشکل بساط محفلی بود
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به هر محفل مرا دسته گلی بود به هریک دسته اش هم سنبلی بود
زعطر و بوی سنبل مست گشتم ز همسر مستی ام چون بلبلی بود
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روز دوشنبه مورّخۀ 13/11/1399
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اينجانب عباس توكلي فرزند مرحوم كربلايي مهدي توكلي، مايل هستم از طريق اين وبلاگ، با اهالي روستاي كلاونگا، در جهت يادآوري آداب و رسوم (فرهنگي، اجتماعي، مذهبي) و آشنايي مجدد افراد با آنها، ارتباط برقرار نمايم. همچنين انتظار ميرود اهالي محترم در جهت نيل به عمران و آبادي روستا با اعضاي محترم شوراي اسلامي، همكاري بيش از پيش داشته باشند. بنابراين همت مضاعف و كار مضاعف همه دوستان را آرزومندم.