دوبیتی های سوگ همسر-22
بسمۀ تعالی
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دوبیتی های سوگ همسر-22
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به یادت اشک غم غلطد به صورت چرا اُفتم چنین در رنج و زحمت
ندارم دوریت را من به طاقت به اشکم چاره سازم کُنج عزلت
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من از تنهائیم نالم همیشه ندارم من کسی را کارو پیشه
نشینم درد دل را گفته باشم که جان تازه ای آید به ریشه
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شود مرهم به دل بهر مُداوا غم دل کهنه است عمقش بُوَدجا
مگر مرهم به عمق دل نشیند که آن گه می شود آرامش ما
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مُداوایش بسی مشکل نماید دلم از ریشه اش در درد آید
بپیچاند مرا در جمع و تنها نباشد چاره تا تسکین بیاید
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خداوندا تو تسکینم بیاور نباشد انتظار از کس چو داور
مرا اُمّید تو آسان کند کار شود روشن دلم از دست زنگار
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تو را نیّت، بشوید این دلم را جلی دارد دل و هم محفلم را
خدایاچون توئی فریادرس نیست کنم هدیه دل نا قابلم را
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فدائی گر بخواهی حاضرم من دهم جانم، چه باشد قابل از تن
شود همسر درآنجا راحت از درد من هم راضی شوم،دورم ز دشمن
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دلا کن جست و جو تا مرهم آری به زخم کهنه ات آن را نشانی
خدا خواهد دلم هم گر بخواهد رها یابد ز غم ها، تا زمانی
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دلم در سینه دارد انتظارات که هر کس رهرسد،دارد ملاقات
نباشد این چنین شایستگی را شود در بررسی، دفع مضرّات
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دلی با دل شود آکنده هر جا دودل یک دل شود هرجای دنیا
مزیّت باشد آن ها را به عالم که کفو یکدگر باشند چو زهرا
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علیّ و فاطمه بودند چنینی که فرزندانشان گشتند حسینی
علی کفو،فاطمه کفو شدحسن کفو حسین کفوش نهایت شد خمینی
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چو زینب در جهان هرگز نیاید چو عبّاس علی اصلاً نشاید
علیّ و فاطمه بودند یکدست که آن امّ البنین عبّاس زاید
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همه را شاهد آوردم بدانی مرا کفو بوده ای داری نشانی
نبوده اختلاف مابین هرگز خودت دانی نشان از هر که خواهی
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ندیده کس کنیم پرخاش بر هم به هر جا بوده ایم در سایه بر هم
تو را من دوست بودم هم تو دوستم چه عزّت بوده یک عمری که جُستم
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روز سه شنبه 7/11/1399
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اينجانب عباس توكلي فرزند مرحوم كربلايي مهدي توكلي، مايل هستم از طريق اين وبلاگ، با اهالي روستاي كلاونگا، در جهت يادآوري آداب و رسوم (فرهنگي، اجتماعي، مذهبي) و آشنايي مجدد افراد با آنها، ارتباط برقرار نمايم. همچنين انتظار ميرود اهالي محترم در جهت نيل به عمران و آبادي روستا با اعضاي محترم شوراي اسلامي، همكاري بيش از پيش داشته باشند. بنابراين همت مضاعف و كار مضاعف همه دوستان را آرزومندم.